Tuesday, August 14, 2018

आशुतोष ने दिया आम आदमी पार्टी से इस्तीफ़ा

पत्रकारिता छोड़कर आम आदमी पार्टी में आए आशुतोष ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है.
आशुतोष ने ट्विटर पर अपने इस्तीफ़े की घोषणा की और कहा कि वे निजी कारणों से ऐसा कर रहे हैं.
ट्विटर पर उन्होंने लिखा, "सभी सफ़र ख़त्म होते हैं. आप के साथ मेरे सुंदर/क्रांतिकारी ताल्लुकात ख़त्म हो गए हैं. मैंने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है और पीएसी से इसे स्वीकार करने का अनुरोध किया है. यह पूरी तरह से व्यक्तिगत कारणों से है. पार्टी और अन्य सभी लोगों का जिन्होंने मेरा साथ दिया उनका धन्यवाद. धन्यवाद."
पत्रकारिता छोड़कर राजनीति में आए आशुतोष ने 2014 में आम आदमी पार्टी में शामिल हुए थे. उसी साल लोकसभा चुनाव में चांदनी चौक से पार्टी के उम्मीदवार बनाए गए थे लेकिन तीन लाख से अधिक वोट लाने के बावजूद चुनाव में वो हर्षवर्धन से हार गए थे.
उसी दौरान कुमार विश्वास, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, शाज़िया इल्मी, कैप्टन गोपीनाथ जैसे कई लोग आम आदमी पार्टी से जुड़े थे लेकिन ये सभी पार्टी छोड़ चुके हैं.
उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का बेहद क़रीबी माना जाता रहा है लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आशुतोष राज्यसभा नहीं भेजे जाने की वजह से नाराज़ चल रहे थे.
आम आदमी पार्टी ने संजय सिंह, सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता को राज्यसभा में भेजा था.
आशुतोष के इस्तीफ़े के बाद आम आदमी पार्टी में उनके साथी रहे कुमार विश्वास ने ट्वीट करके पार्टी और शीर्ष नेतृत्व पर तंज़ किया है.
सात मार्च 1971 के दिन ढाका का रेसकोर्स मैदान लोगों से खचाखच भरा था. वहाँ मौजूद लगभग दस लाख लोगों के हाथों में बांस के डंडे थे, पाकिस्तानी सैनिकों के संभावित हमले से बचने के लिए नहीं, बल्कि एक प्रतिरोध या अवज्ञा के प्रतीक के तौर पर.
आज़ादी के पक्ष में नारे रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. भीड़ का जायज़ा लेने के लिए पाकिस्तानी सेना का एक हेलिकॉप्टर ऊपर चक्कर लगा रहा था. सरकारी आदेश की अवहेलना करते हुए रेडियो पाकिस्तान का ढाका स्टेशन शेख़ मुजीब के उस भाषण को पूरे प्रांत में लाइव प्रसारित करने की अंतिम तैयारी कर रहा था.
हालांकि सेना ने भी उनकी इस कोशिश को विफल करने की पूरी तैयारी कर रखी थी. शेख़ मुजीब ने बोलना शुरू किया. वो भाषण नहीं एक ललकार थी पाकिस्तानी सैनिक शासन के ख़िलाफ़.
बाद में इसे उपमहाद्वीप में दिए गए सभी राजनीतिक भाषणों में सबसे ऊँचे पायदान पर रखा गया.
कुछ दिनों बाद समस्या का राजनीतिक हल ढ़ूँढ़ने के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति याहया ख़ाँ ढाका पहुँचे. फ़ौरन ही संकेत मिलने लगे थे कि याहया ख़ाँ सत्ता सौंपने की पूर्वी पाकिस्तान के लोगों की माँग को अस्वीकार करने जा रहे थे.
23 मार्च को जब शेख़, याहया से बात करने प्रेसीडेंट हाउस गए तो उनकी कार में बांग्लादेश का झंडा लगा हुआ था, मानो वो आज़ाद बंगाली राज्य के नेता के पद पर आसीन हो चुके हों.मार्च की शाम होते-होते ये ख़बर फैलने लगी कि राष्ट्रपति याहया ख़ाँ अपने दल सहित वापस पाकिस्तान लौट गए हैं. रात साढ़े ग्यारह बजे लगा कि जैसे पूरे शहर पर पाकिस्तानी सेना ने हमला बोल दिया हो.
ऑपरेशन सर्चलाइट की शुरुआत हो चुकी थी. सैयद बदरुल अहसन अपनी किताब फ़्रॉम रेबेल टु फ़ाउंडिंग फ़ादर में लिखते हैं कि शेख़ की सबसे बड़ी बेटी हसीना ने उन्हें बताया कि जैसे ही गोलियों की आवाज़ सुनाई दी, शेख़ ने वायरलैस से संदेश भेज बांग्लादेश की आज़ादी की घोषणा कर दी.
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शेख़ ने कहा, "मैं बांग्लादेश के लोगों का आह्वाहन करता हूँ कि वो जहाँ भी हों और जो भी उनके हाथ में हो, उससे पाकिस्तानी सेना का प्रतिरोध करें. आपकी लड़ाई जब तक जारी रहनी चाहिए जब तक पाकिस्तानी सेना के एक-एक सैनिक को बांग्लादेश की धरती से निष्कासित नहीं कर दिया जाता."
रात को क़रीब एक बजे पाकिस्तानी सेना का एक दल, 32 धनमंडी स्थित शेख़ मुजीब के घर पर पहुंचा जहाँ शेख़ मुजीब उनका इंतज़ार कर रहे थे. गेट पर पहुंचते ही सैनिकों ने ताबड़तोड़ गोलियाँ चलानी शुरू कर दी. शेख़ की सुरक्षा देख रहे एक स्थानीय सुरक्षा कर्मी को भी एक गोली लगी और उसकी तुरंत मौत हो गई.
सेना के एक अफ़सर ने लाउडस्पीकर पर चिल्ला कर कहा कि शेख़ नीचे आकर सेना के सामने आत्म समर्पण करें. शेख़ खुद नीचे चल कर आए जहाँ सेनिकों ने बंदूक़ों के बट से धक्का देते हुए उन्हें एक जीप में बैठाया और वहाँ से निकल गए.
शेख़ को गिरफ़्तार करने वाले अफ़सर ने वायरलेस पर संदेश दिया, "बिग बर्ड इन केज, स्मॉल बर्ड्स हैव फ़्लोन.'' (बड़ी चिड़िया पिंजड़े में हैं, छोटी चिड़िया उड़ गई हैं)
बदरुल अहसन लिखते हैं कि शेख़ को गिरफ़्तार करने वाले अफ़सर ने जनरल टिक्का खाँ से फ़ोन पर पूछा, "क्या वो चाहते हैं कि शेख़ मुजीब को उनके सामने पेश किया जाए."
जनरल ने ग़ुस्से में जवाब दिया था, "मैं उसका चेहरा नहीं देखना चाहता." शेख़ को तीन दिनों तक कैंटोनमेंट के आदमजी कॉलेज में रखा गया और फिर कड़ी सुरक्षा के बीच पाकिस्तान ले जाया गया.

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